



बलौदाबाजार में राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का आयोजन, हिंदी की वैज्ञानिकता, भाषाई विविधता और भारतीय भाषाओं के समन्वय पर विद्वानों ने रखे विचार
न्यूज मंच /बलौदाबाजार/ हिंदी भाषा वैज्ञानिक, समृद्ध और व्यापक स्वीकार्यता वाली भाषा है। भाषा की सार्थकता उसके शब्दों में ही नहीं, बल्कि भावों को एक-दूसरे तक पहुंचाने की क्षमता में भी निहित है। “भाव अनूठे चाहिए, भाषा कोई होय” का संदेश देते हुए प्रो. (डॉ.) अनुसुइया अग्रवाल ने कहा कि भाषा दिल से निकलकर दिल तक पहुंचती है।वे 16 अक्टूबर 2026 को शासकीय दाऊ कल्याण कला एवं वाणिज्य स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बलौदाबाजार के हिंदी विभाग द्वारा ‘संपर्क भाषा हिंदी: चुनौतियां एवं संभावनाएं’ विषय पर आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में विशेष अतिथि के रूप में संबोधित कर रही थीं।प्रो. (डॉ.) अनुसुइया अग्रवाल, डी.लिट., प्राचार्य स्वामी आत्मानंद शासकीय अंग्रेजी माध्यम आदर्श महाविद्यालय, महासमुंद ने हिंदी की वैज्ञानिकता और समृद्धि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिंदी की लिपि देवनागरी है, जिसकी वर्णमाला वैज्ञानिक क्रम में व्यवस्थित है। इसमें कंठ्य, तालव्य और मूर्धन्य जैसी ध्वनियों के आधार पर वर्णों का वर्गीकरण किया गया है। उन्होंने कहा कि हिंदी में अन्य भाषाओं के शब्दों को आत्मसात करने की उदार क्षमता है। अरबी, फारसी, अंग्रेजी, तुर्की और पुर्तगाली जैसी भाषाओं के अनेक शब्द हिंदी में प्रचलित हैं। यही विशेषता हिंदी को व्यापक और समृद्ध बनाती है।उन्होंने हिंदी भाषा एवं साहित्य में शोध और अनुसंधान की संभावनाओं पर भी विचार व्यक्त किए। कविता के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन और रचनात्मक चेतना की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए उन्होंने विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को गंभीर अध्ययन के लिए प्रेरित किया। उन्होंने भाषा और साहित्य को सामाजिक चेतना के विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बताया।
भारतीय भाषाओं के संरक्षण और सम्मान पर जोर
संगोष्ठी के दूसरे विशिष्ट अतिथि प्रो. (डॉ.) जी.ए. घनश्याम ने कहा कि भारत की वास्तविक समृद्धि उसकी भाषाई विविधता में निहित है। हिंदी के विकास को अन्य भारतीय भाषाओं के संरक्षण और सम्मान से जोड़ते हुए उन्होंने भाषाई प्रतिस्पर्धा के स्थान पर समन्वय एवं संवाद को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि विभिन्न भाषाओं के बीच परस्पर सहयोग से ही भारतीय भाषायी संस्कृति को समृद्ध बनाया जा सकता है।
मुख्य अतिथि के प्रतिनिधि एवं जनभागीदारी समिति के सदस्य एम.एस. पाध्ये ने संगोष्ठी के आयोजन की सराहना करते हुए हिंदी विभाग और महाविद्यालय परिवार को बधाई दी। साथ ही महाविद्यालय की निरंतर प्रगति की कामना की।अध्यक्षीय उद्बोधन में महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. धनंजय मिश्रा ने संगोष्ठी के विषय की अकादमिक प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए प्रतिभागियों को गंभीर अध्ययन एवं चिंतन के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन शैक्षणिक वातावरण को बेहतर बनाने और शोधपरक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
500 से अधिक प्रतिभागियों ने लिया हिस्सा
संगोष्ठी के संयोजक एवं हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. हीरालाल शर्मा ने विषय के औचित्य और वर्तमान संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता को स्पष्ट किया। हिंदी विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ. रीता यादव ने विभागीय प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।संगोष्ठी में 500 से अधिक प्रतिभागियों, महाविद्यालय के प्राध्यापकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने सहभागिता की। इस दौरान हिंदी की संपर्क भाषा के रूप में भूमिका, भारतीय भाषाओं का संरक्षण, भाषाई विविधता और समकालीन परिदृश्य में हिंदी की प्रासंगिकता जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की सार्थकता केवल उसके व्यापक प्रयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि विभिन्न भाषायी समुदायों के बीच संवाद स्थापित करने की उसकी क्षमता में भी निहित है। हिंदी को सशक्त बनाने के लिए मातृभाषाओं और क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान, भाषाई विविधता का संरक्षण तथा भारतीय भाषाओं के बीच परस्पर सहयोग आवश्यक है।
‘वसुंधरा’ पत्रिका और पुस्तक का विमोचन
कार्यक्रम का संचालन शोध छात्र दीपक कुमार तिवारी ने किया। इस अवसर पर महाविद्यालय की पत्रिका ‘वसुंधरा’ तथा प्रो. डॉ. हीरालाल शर्मा की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ : परंपरा, प्रयोग’ का विमोचन किया गया। कार्यक्रम के अंत में हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. राजेंद्र वर्मा ने आभार व्यक्त किया।

