8 अक्टूबर. 2024/ महासमुंद/ उक्त उद्गार देश की प्रतिष्ठित संस्था राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के तत्वावधान में शक्ति की अवधारणा एवं उपासना : दर्शन, साहित्य एवं संस्कृति विषय पर आयोजित राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में बतौर विशिष्ट अतिथि प्रो डॉ अनुसुइया अग्रवाल डी लिट् प्राचार्य शासकीय महाप्रभु वल्लभाचार्य स्नातकोत्तर महाविद्यालय महासमुन्द व्यक्त कर रही थी। संगोष्ठी में मुख्य वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा एवं मुख्य अतिथि नागरी लिपि परिषद नई दिल्ली के महामंत्री डॉ हरिसिंह पाल थे। अपने वक्तव्य को आगे बढ़ते हुए डॉ अग्रवाल ने कहा कि भारतीय संस्कृति सदैव से उत्सव धर्मिता प्रधान रही है। त्योहारों की अवधारणा भी उद्देश्य पूर्ण रही । नवरात्र को शक्ति अधिष्ठात्री देवी की आराधना एवं शक्ति पूजा का पर्व कहा जाता है। हमारी संस्कृति में जगत माता के रूप में शक्ति की स्तुति करते हुए कहा गया है कि “या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ” आदिशक्ति के त्रिगुणात्मक रूप है। सात्विक रूप में वे सरस्वती हैं; सरस्वती बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी है। बुद्धि को शक्ति एवं ऐश्वर्य से श्रेष्ठ माना जाता है। राजसी रूप में वे लक्ष्मी है और तामसी रूप में वे काली हैं ।त्रिगुणात्मक शक्ति अर्जित करके ही बुद्धि, श्रम, ऊर्जा एवं श्री द्वारा राष्ट्र को शक्ति संपन्न बनाया जा सकता है। वास्तव में नवरात्र सामूहिक साधना का एक ऐसा पर्व है जिसे सामूहिक रूप से मनाने के मूल में राष्ट्रीय संगठन एवं सहकारिता की भावना भी पुष्ट होती है।

डॉ. शैलेंद्र कुमार शर्मा, हिंदी विभागाध्यक्ष एवं कुलानुशासक विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन ने कहा कि भारतीय चिंतन से व्यवहार तक शक्ति तत्व की महिमा है। शक्ति की सत्ता को वेदों और पुराख्यानों में विशेष महत्व मिला है।

डॉ हरिसिंह पाल नई दिल्ली ने मुख्य अतिथि के रूप में मंतव्य देते हुए कहा कि हमारे पर्व हमें व्यापक मानवता से जोड़ते हैं। नवरात्रि पर्व मनसा, वाचा, कर्मणा शुद्ध होने का पर्व है।

डॉ. दक्षा जोशी , गुजरात, उपाध्यक्ष राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना ने कहा, मोहनजोदड़ो में 4000 ईसा पूर्व के मिले अवशेष में शक्ति की मूर्तियां पाई गईं जिससे सिद्ध होता है कि, शक्ति उपासना अति प्राचीन है।

डॉ. सुवर्णा जाधव पुणे महाराष्ट्र, कार्यकारी अध्यक्ष राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना ने कहा – गरबा नृत्य में गोल घूमना जीवन से मृत्यु के चक्र को दर्शाता है।

डॉ. अर्चना कुमारी ने कहा कि अखिल ब्रह्मांड के चराचर जितने भी प्राणी हैं, उनका सृजन, पालन हेतु मां ने अनेक समय में अनेक रूप में अवतार लिया।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. रश्मि चौबे, गाजियाबाद राष्ट्रीय प्रवक्ता, राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना ने किया। प्रस्तावना डॉ. प्रभु चौधरी, कोषाध्यक्ष, राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना ने प्रस्तुत की और आभार डॉ. शहनाज शेख ने आभार व्यक्त करते हुए कहा, हम देवी मानते हैं तो उनके साथ दुर्व्यवहार न करें। गोष्ठी में अनेक गणमान्य जन उपस्थित रहे।

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